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लोकतंत्र में सहमति की राजनीति और आम नागरिक की चिंता

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 नववर्ष विक्रम संवत 2083 के अवसर पर शुभकामनाओं के साथ एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है—क्या हमारे लोकतंत्र में असहमति की आवाज़ कमजोर पड़ती जा रही है? आज देश की संसद में संवैधानिक मुद्दों पर बहस कम और राजनीतिक सहमति ज्यादा देखने को मिलती है। यह सहमति लोकतंत्र के लिए सकारात्मक भी हो सकती है, लेकिन जब यह जनता के मूल मुद्दों—रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा—को पीछे छोड़ देती है, तब यह चिंता का विषय बन जाती है। आम नागरिक महसूस करता है कि उसकी समस्याओं पर गंभीर चर्चा कम हो रही है। इतिहास गवाह है कि मजबूत लोकतंत्र वही होता है, जहां सत्ता और विपक्ष के बीच स्वस्थ बहस हो। पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के समय 42वें संविधान संशोधन के जरिए कई बड़े बदलाव किए गए थे, जिन पर उस समय व्यापक चर्चा और विरोध भी हुआ। यह उदाहरण बताता है कि लोकतंत्र में असहमति भी उतनी ही जरूरी है जितनी सहमति। वर्तमान समय में जनता के सामने सबसे बड़ी चिंता सुरक्षा और सामाजिक संतुलन की है। आम नागरिक अपने परिवार की सुरक्षा, बच्चों के भविष्य और सामाजिक सौहार्द को लेकर चिंतित है। विशेष रूप से सीमावर्ती क्षेत्रों म...