गणगौर पर्व पर ढोकळियों की महकने लगी पारंपरिक खुशबू
गणगौर पर्व पर महकने लगी ढोकले की यूनिक खुशबू भूर घास की सौंधी महक से तैयार होता है पारंपरिक ‘ढोकळिया’, गांवों में आज भी जीवित है सदियों पुरानी परंपरा राजस्थान में जैसे ही गणगौर पर्व का समय नजदीक आता है, गांवों की फिजाओं में एक अलग ही खुशबू घुलने लगती है। यह खुशबू किसी इत्र या कृत्रिम सुगंध की नहीं, बल्कि देसी चूल्हे पर भाप में पक रहे पारंपरिक ढोकलों (ढोकळिया) की होती है। यह वही खास व्यंजन है, जो न केवल स्वाद बल्कि अपनी प्राकृतिक सुगंध के लिए भी जाना जाता है। इस खुशबू के पीछे सबसे बड़ा कारण है— भूर या बूर (Boor) घास , जिसे देग में बिछाकर ढोकले तैयार किए जाते हैं। बूर घास: रेगिस्तान की खुशबू से जुड़ी पहचान पश्चिमी राजस्थान के बीकानेर, जैसलमेर और श्रीगंगानगर सहित कई शुष्क क्षेत्रों में पाई जाने वाली भूर घास का वैज्ञानिक नाम Cenchrus biflorus है। यह घास कठोर जलवायु में भी आसानी से उग जाती है और कम पानी में भी जीवित रहती है। भूर घास की खासियत सिर्फ इसकी मजबूती ही नहीं, बल्कि इसमें मौजूद हल्की प्राकृतिक सुगंध भी है। सूखने के बाद इसकी खुशबू और भी अधिक स्पष्ट हो जात...