विनम्र श्रद्धांजलि: कामरेड हेतराम बेनीवाल
- विनम्र श्रद्धांजलि: कामरेड स्व. श्री हेतराम जी बेनीवाल
“माइक की जरूरत नहीं थी उन्हें…
श्रीगंगानगर। कुछ आवाजें वक्त के साथ धीमी पड़ जाती हैं, लेकिन कुछ आवाजें इतिहास बन जाती हैं। कामरेड हेतराम बेनीवाल उन्हीं आवाजों में से एक थे। 94 वर्ष की आयु में उनके निधन के साथ राजस्थान की जनसंघर्ष राजनीति का एक जीवंत अध्याय मानो ठहर गया है। वे सिर्फ एक पूर्व विधायक नहीं थे, वे आंदोलन की धड़कन थे।
कहा जाता है कि उन्हें कभी माइक्रोफोन की जरूरत नहीं पड़ी। हजारों की भीड़ के बीच खड़े होकर वे जिस आत्मविश्वास और स्पष्टता के साथ बोलते थे, वह उनके विचारों की शक्ति का प्रमाण था। उनकी आवाज में आक्रोश नहीं, आस्था थी — व्यवस्था बदलने की आस्था, समाज को न्याय दिलाने की आस्था।
साधारण जीवन, असाधारण प्रतिबद्धता
10 जून 1934 को पंजाब के सुखचैन में जन्मे हेतराम बेनीवाल ने सादगी को जीवन का आधार बनाया। बीकानेर के डूंगर कॉलेज से एम.ए. की शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने कृषि को अपना व्यवसाय चुना। लेकिन उनका मन खेत की मेड़ों से आगे, किसान के अधिकारों की लड़ाई में लगा रहा।
वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से जुड़े और गंगानगर में संगठनात्मक जिम्मेदारियां निभाईं। उनके लिए राजनीति सत्ता का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का साधन थी।
विधानसभा तक पहुंची जनसंघर्ष की आवाज
वर्ष 1990 से 1992 तक वे नौवीं राजस्थान विधानसभा के सदस्य रहे। विधायक बनने के बाद भी उनका स्वभाव नहीं बदला। वे सदन में भी उसी स्पष्टता से बोलते थे, जैसे किसी गांव की चौपाल में।
राजकीय उपक्रम समिति, संसदीय परामर्शदात्री समिति, पुस्तकालय समिति और अधीनस्थ विधान संबंधी समिति में उनकी सक्रिय भूमिका रही। वे मुद्दों को आंकड़ों और तथ्यों के साथ रखते थे। सत्ता पक्ष को सवालों के घेरे में लेने में वे कभी हिचकते नहीं थे।
लेकिन उनके लिए विधानसभा मंजिल नहीं थी — वह सिर्फ एक मंच था। असली मंच तो खेत, खलिहान और आंदोलन की सड़कें थीं।
संघर्ष, जेल और अडिग विचार
1980 से 1990 के बीच विभिन्न किसान और मजदूर आंदोलनों में भागीदारी के कारण उन्होंने लगभग 4 से 5 वर्ष जेल यात्राएं कीं। आज के दौर में जब छोटी असुविधा भी बड़े त्याग की तरह बताई जाती है, तब बेनीवाल का जेल जाना उनके विचारों के प्रति प्रतिबद्धता का साक्ष्य था।
वे जानते थे कि संघर्ष आसान नहीं होता। लेकिन वे यह भी जानते थे कि बिना संघर्ष के बदलाव संभव नहीं।
घड़साना पानी आंदोलन की याद
घड़साना पानी आंदोलन (2004-06) उनके जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय रहा। यह आंदोलन सिर्फ पानी का मुद्दा नहीं था, बल्कि सम्मान और अधिकार का प्रश्न था। उन्होंने किसानों को एकजुट रहने की शपथ दिलाई। उनके भाषणों में जो ऊर्जा होती थी, वह भीड़ को आंदोलन में बदल देती थी।
लोग कहते हैं कि वे बिना माइक के भी हजारों लोगों तक अपनी बात पहुंचा देते थे। उनकी वाणी में तीखा व्यंग्य भी होता था और जनभावना भी। वे हंसते हुए व्यवस्था पर चोट करते थे।
सादगी की मिसाल
व्यक्तिगत जीवन में वे बेहद सरल थे। न कोई दिखावा, न वैभव। उनका स्थायी निवास श्रीगंगानगर के 8, एल.एम.पी. क्षेत्र में रहा। पत्नी श्रीमती चंद्रावल, दो पुत्र और एक पुत्री का परिवार — लेकिन सार्वजनिक जीवन में उनका परिवार और भी बड़ा था — किसान, मजदूर और आमजन।
वे जनसरोकारों से जुड़े नेता थे। जल अधिकार, ग्रामीण विकास और मजदूर हित उनके जीवन के केंद्रीय विषय रहे।
एक विचार का अंत नहीं, विरासत की शुरुआत
आज जब राजनीति में विचारधारा की जगह तात्कालिक लाभ और छवि निर्माण अधिक दिखाई देता है, तब कामरेड हेतराम बेनीवाल का जीवन एक आईना बनकर सामने आता है। वे बताते हैं कि राजनीति मूलतः जनसेवा है, पद नहीं।
उनका निधन किसान आंदोलनों और वामपंथी राजनीति के लिए निश्चित ही बड़ी क्षति है। लेकिन उनके विचार, उनका संघर्ष और उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बने रहेंगे।
वे चले गए हैं, लेकिन खेतों में उठने वाली आवाज, चौपालों में होने वाली चर्चा और आंदोलन की यादों में उनका नाम जीवित रहेगा।
कामरेड हेतराम बेनीवाल अब इतिहास का हिस्सा हैं — और इतिहास की आवाज कभी खामोश नहीं होती।
विनम्र श्रद्धांजलि।

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राकेश खुडिया