इच्छा मृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा रुख: क्या भारत में गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार संभव है?
इच्छा मृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण: करुणा, गरिमा और कानून के बीच संतुलन
Trend2in Editorial
भारत में इच्छा मृत्यु (Euthanasia) का मुद्दा लंबे समय से नैतिक, सामाजिक और कानूनी बहस का विषय रहा है। यह प्रश्न केवल चिकित्सा व्यवस्था या कानून तक सीमित नहीं है, बल्कि मानव जीवन की गरिमा, करुणा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ है। जब कोई व्यक्ति असाध्य बीमारी से पीड़ित होकर असहनीय दर्द झेल रहा हो और उसके ठीक होने की कोई संभावना न हो, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या उसे गरिमा के साथ मृत्यु चुनने का अधिकार होना चाहिए।
भारत में इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर महत्वपूर्ण फैसले दिए हैं, जिन्होंने इस संवेदनशील मुद्दे को समझने और संतुलित दृष्टिकोण विकसित करने की दिशा में मार्गदर्शन किया है। अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि जीवन का अधिकार केवल जीवित रहने का अधिकार नहीं, बल्कि गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार भी है।
संविधान और जीवन के अधिकार की व्याख्या
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि यह अधिकार मृत्यु चुनने का अधिकार प्रदान नहीं करता। 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने Gian Kaur बनाम पंजाब राज्य मामले में स्पष्ट किया कि आत्महत्या या मृत्यु का अधिकार संविधान द्वारा संरक्षित अधिकार नहीं है।
हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार संविधान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसी विचार ने आगे चलकर इच्छा मृत्यु पर न्यायिक दृष्टिकोण को प्रभावित किया।
अरुणा शानबाग मामला: बहस का निर्णायक मोड़
भारत में इच्छा मृत्यु पर सबसे चर्चित मामला अरुणा शानबाग का रहा। 1973 में एक नर्स अरुणा शानबाग पर अस्पताल में हमला हुआ था, जिसके बाद वह लगभग चार दशक तक कोमा जैसी स्थिति में रहीं।
2011 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए Passive Euthanasia यानी निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को सीमित परिस्थितियों में अनुमति दी। अदालत ने कहा कि यदि कोई मरीज लंबे समय से असाध्य अवस्था में है और उसके ठीक होने की कोई संभावना नहीं है, तो अदालत की अनुमति और विशेषज्ञ डॉक्टरों की राय के आधार पर जीवन रक्षक उपकरण हटाए जा सकते हैं।
यह निर्णय भारतीय न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था, क्योंकि पहली बार अदालत ने मानव पीड़ा और गरिमा के प्रश्न को कानूनी दृष्टि से स्वीकार किया।
2018 का ऐतिहासिक फैसला: लिविंग विल की मान्यता
2018 में सुप्रीम कोर्ट ने Common Cause बनाम भारत संघ मामले में एक और ऐतिहासिक फैसला दिया। अदालत ने Living Will या Advance Directive को मान्यता दी।
इसका अर्थ यह है कि कोई भी व्यक्ति स्वस्थ अवस्था में यह लिखित घोषणा कर सकता है कि यदि भविष्य में वह असाध्य स्थिति में पहुंच जाए और सामान्य जीवन संभव न हो, तो उसे कृत्रिम जीवन रक्षक उपचार न दिया जाए।
यह निर्णय व्यक्ति की स्वायत्तता और गरिमा को सम्मान देने की दिशा में एक बड़ा कदम माना गया।
नैतिक और सामाजिक चिंताएँ
हालांकि इच्छा मृत्यु को लेकर कई नैतिक और सामाजिक चिंताएं भी सामने आती हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस व्यवस्था पर पर्याप्त निगरानी न हो तो इसका दुरुपयोग संभव है।
कई बार आर्थिक बोझ, संपत्ति विवाद या पारिवारिक दबाव जैसी परिस्थितियां गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति के जीवन को खतरे में डाल सकती हैं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया को सख्त चिकित्सकीय और कानूनी निगरानी के तहत लागू करने पर जोर दिया है।
यह भी जरूरी है कि समाज में इस विषय पर संवेदनशील चर्चा हो और इसे केवल भावनात्मक या धार्मिक विवाद का विषय न बनाया जाए।
चिकित्सा व्यवस्था की भूमिका
इच्छा मृत्यु के प्रश्न में डॉक्टरों और चिकित्सा संस्थानों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। डॉक्टरों का प्राथमिक कर्तव्य जीवन बचाना होता है, लेकिन जब किसी मरीज के ठीक होने की कोई संभावना नहीं होती और वह असहनीय पीड़ा में होता है, तब स्थिति जटिल हो जाती है।
ऐसे मामलों में चिकित्सा विशेषज्ञों की समिति, नैतिक समीक्षा और कानूनी प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि निर्णय मानवीय संवेदनाओं और चिकित्सा नैतिकता दोनों के अनुरूप हो।
मानवीय दृष्टिकोण की आवश्यकता
इच्छा मृत्यु का प्रश्न केवल कानून या चिकित्सा विज्ञान का विषय नहीं है, बल्कि मानव जीवन की गरिमा से जुड़ा हुआ है। जब कोई व्यक्ति असहनीय पीड़ा से गुजर रहा हो और उसके ठीक होने की कोई संभावना न हो, तब समाज को संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता होती है।
इस विषय पर संतुलित और मानवीय दृष्टिकोण ही सही समाधान की दिशा दिखा सकता है।
निष्कर्ष
भारत में इच्छा मृत्यु को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने एक संतुलित मार्ग अपनाने की कोशिश की है। अदालत ने एक ओर जीवन की पवित्रता को महत्व दिया है, तो दूसरी ओर मानव गरिमा और पीड़ा को भी नजरअंदाज नहीं किया।
अब आवश्यकता इस बात की है कि समाज, चिकित्सा व्यवस्था और नीति निर्माता मिलकर इस संवेदनशील विषय पर जिम्मेदार और मानवीय दृष्टिकोण अपनाएं। पारदर्शिता, सख्त निगरानी और संवेदनशीलता के साथ ही इच्छा मृत्यु से जुड़े निर्णयों को लागू किया जा सकता है।
अंततः यह समझना होगा कि कानून का उद्देश्य केवल जीवन को किसी भी कीमत पर बनाए रखना नहीं, बल्कि मानव गरिमा और करुणा दोनों की रक्षा करना भी है।
— राकेश खुडिया

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राकेश खुडिया