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871 साल बाद जैसलमेर में महा आयोजन, मोहन भागवत ने जैन दर्शन से समझाया समाज की एकता का फॉर्मूला

 

मोहान भागवत का संदेश: ‘ध्यान को दिखते हैं दो रंग और मुर्गी को तीन’, जैन दर्शन के जरिए समझाया एकता का सूत्र

जैसलमेर के सोनार किले की संकरी गलियों में ई-रिक्शा से जाते RSS प्रमुख मोहन भागवत, सुरक्षा कर्मियों के साथ ऐतिहासिक दौरे का दृश्य


राजस्थान की स्वर्ण नगरी जैसलमेर शुक्रवार को एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक संगम की साक्षी बनी, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत यहां आयोजित ‘चादर महोत्सव’ में शामिल हुए। सोनार किले की प्राचीरों के भीतर आयोजित इस कार्यक्रम में भागवत ने जैन दर्शन का उदाहरण देते हुए समाज में एकता और सहअस्तित्व का संदेश दिया।

अपने संबोधन में उन्होंने एक रोचक उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि प्रकृति में अलग-अलग जीवों की देखने और समझने की क्षमता अलग होती है। “ध्यान को दो रंग दिखाई देते हैं और मुर्गी को तीन रंग दिखाई देते हैं।” इस उदाहरण के माध्यम से उन्होंने समझाने की कोशिश की कि हर व्यक्ति का दृष्टिकोण अलग हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि कोई दृष्टिकोण गलत है।

भागवत ने कहा कि समाज में मतभेद होना स्वाभाविक है। अलग-अलग विचार, परंपराएं और मान्यताएं किसी भी समाज की विविधता को दर्शाती हैं। लेकिन इन मतभेदों को टकराव का कारण नहीं बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब हम दूसरों के विचारों को समझने और स्वीकार करने की क्षमता विकसित करते हैं, तभी समाज में सच्ची एकता संभव होती है।

जैन दर्शन से दिया सहअस्तित्व का संदेश

अपने भाषण में भागवत ने जैन दर्शन के सिद्धांतों का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि जैन दर्शन का मूल भाव ‘अनेकांतवाद’ है, जिसका अर्थ है कि सत्य को कई दृष्टिकोणों से समझा जा सकता है। किसी एक व्यक्ति या समूह का दृष्टिकोण ही पूर्ण सत्य नहीं होता।

उन्होंने कहा कि यदि समाज में हर व्यक्ति यह समझ ले कि दूसरे का दृष्टिकोण भी किसी हद तक सही हो सकता है, तो कई विवाद स्वतः समाप्त हो सकते हैं। जैन दर्शन का यह सिद्धांत हमें सहिष्णुता और परस्पर सम्मान की भावना सिखाता है।

भागवत ने कहा कि भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यहां विभिन्न धर्मों, परंपराओं और विचारधाराओं को एक साथ स्थान मिला है। भारत की यही विविधता उसकी ताकत है।

871 वर्षों बाद ऐतिहासिक आयोजन

कार्यक्रम के आयोजकों के अनुसार, यह चादर महोत्सव लगभग 871 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद आयोजित किया जा रहा है। इस ऐतिहासिक आयोजन ने जैसलमेर को एक बार फिर धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र में ला दिया।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साधु-संत, धार्मिक नेता और श्रद्धालु शामिल हुए। सोनार किले के भीतर आयोजित इस कार्यक्रम में आध्यात्मिक वातावरण देखने को मिला। श्रद्धालुओं ने इसे एक ऐतिहासिक और यादगार अवसर बताया।

इस आयोजन ने केवल धार्मिक महत्व ही नहीं बल्कि सामाजिक संदेश भी दिया। कार्यक्रम में मौजूद वक्ताओं ने समाज में शांति, भाईचारे और सहअस्तित्व की भावना को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

विविधता में एकता का संदेश

भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में एकता बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती भी है और सबसे बड़ी ताकत भी। उन्होंने कहा कि अलग-अलग भाषा, संस्कृति और परंपराओं के बावजूद भारत एक राष्ट्र के रूप में मजबूत बना हुआ है।

उन्होंने कहा कि यह तभी संभव है जब समाज के सभी वर्ग एक-दूसरे के विचारों का सम्मान करें। यदि हम केवल अपने दृष्टिकोण को ही सही मानते हैं और दूसरों को गलत समझते हैं, तो समाज में विभाजन की स्थिति पैदा हो सकती है।

उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि वे मतभेदों को संघर्ष का कारण बनाने के बजाय संवाद और समझ का माध्यम बनाएं।

सोशल मीडिया पर चर्चा

मोहान भागवत के इस भाषण के बाद सोशल मीडिया पर भी व्यापक चर्चा देखने को मिली। कई लोगों ने उनके उदाहरण को दिलचस्प और विचारोत्तेजक बताया। वहीं कुछ लोगों ने इसे समाज में सहिष्णुता और संवाद की आवश्यकता को रेखांकित करने वाला संदेश बताया।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के उदाहरण जटिल दार्शनिक विचारों को सरल भाषा में समझाने का प्रभावी माध्यम बन सकते हैं।

निष्कर्ष

जैसलमेर में आयोजित इस कार्यक्रम में मोहन भागवत का संदेश केवल धार्मिक या दार्शनिक विचारों तक सीमित नहीं था, बल्कि यह समाज में संवाद, सहिष्णुता और एकता की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है।

जैन दर्शन के उदाहरण के माध्यम से उन्होंने यह बताने की कोशिश की कि दुनिया को देखने का हर व्यक्ति का नजरिया अलग हो सकता है। लेकिन यदि हम इन विभिन्न दृष्टिकोणों को समझने और स्वीकार करने की क्षमता विकसित करें, तो समाज में सौहार्द और एकता को मजबूत किया जा सकता है।

आज के समय में जब दुनिया के कई हिस्सों में वैचारिक टकराव और सामाजिक विभाजन की स्थिति दिखाई देती है, ऐसे में सहअस्तित्व और परस्पर सम्मान का यह संदेश और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

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