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Pomato Technology: वैज्ञानिकों ने ग्राफ्टिंग तकनीक से ऐसा पौधा तैयार किया है जिसमें जमीन के ऊपर टमाटर और नीचे आलू उगते हैं। जानिए इस अनोखी एग्री-टेक खेती का विज्ञान, फायदे और भविष्य।

 

Agri Tech Innovation: खेती की दुनिया में वैज्ञानिक प्रयोग लगातार नए रास्ते खोल रहे हैं। अब एक ऐसी तकनीक सामने आई है जिसमें एक ही पौधे पर जमीन के ऊपर टमाटर और जमीन के नीचे आलू उगाए जा सकते हैं। इस अनोखे पौधे को पोमेटो (Pomato) कहा जाता है। सीमित जमीन, किचन गार्डन और शहरी खेती के लिए इसे भविष्य की एक दिलचस्प एग्री-टेक तकनीक माना जा रहा है।

Pomato Technology: एक ही पौधे पर उगेंगे टमाटर और आलू, जानिए खेती की इस अनोखी वैज्ञानिक तकनीक के बारे में

Pomato Technology demonstration where tomato grows above the plant and potato grows underground using grafting technique


भारत सहित दुनिया भर में खेती तेजी से बदल रही है। आधुनिक तकनीक, जैविक शोध और एग्री-टेक प्रयोगों की मदद से वैज्ञानिक ऐसी विधियाँ विकसित कर रहे हैं जिनसे कम जमीन में अधिक उत्पादन लिया जा सके। इसी दिशा में एक अनोखा प्रयोग है पोमेटो (Pomato)

यह ऐसा पौधा है जिसमें जमीन के ऊपर टमाटर और जमीन के नीचे आलू उगते हैं। पहली नजर में यह किसी विज्ञान कथा जैसा लगता है, लेकिन यह पूरी तरह वैज्ञानिक तकनीक पर आधारित है। दरअसल यह दो पौधों को जोड़कर तैयार किया गया एक विशेष ग्राफ्टेड पौधा होता है।

पोमेटो क्या है?

पोमेटो वास्तव में कोई नई सब्जी नहीं है बल्कि यह दो पौधों का संयुक्त रूप है। इसमें आलू और टमाटर के पौधों को ग्राफ्टिंग तकनीक के माध्यम से जोड़ दिया जाता है। इसके बाद यह एक ही पौधे के रूप में विकसित होने लगता है।

इस पौधे की खासियत यह है कि:

  • ऊपरी हिस्सा टमाटर के फल देता है
  • जड़ वाला हिस्सा आलू की गांठें बनाता है
  • एक ही पौधे से दो अलग-अलग सब्जियाँ मिलती हैं

वैज्ञानिक आधार क्या है?

पोमेटो की सफलता का मुख्य कारण यह है कि आलू और टमाटर दोनों एक ही पौधों के परिवार से संबंधित हैं।

वैज्ञानिक वर्गीकरण:

  • परिवार: Solanaceae
  • जीनस: Solanum
  • आलू का वैज्ञानिक नाम: Solanum tuberosum
  • टमाटर का वैज्ञानिक नाम: Solanum lycopersicum

दोनों पौधों के जैविक गुण मिलते-जुलते होने के कारण इनके ऊतक आसानी से आपस में जुड़ जाते हैं और पौधा सामान्य रूप से बढ़ने लगता है।

ग्राफ्टिंग तकनीक क्या होती है?

ग्राफ्टिंग कृषि विज्ञान की एक पुरानी और महत्वपूर्ण तकनीक है जिसमें दो अलग पौधों को जोड़कर एक नया पौधा तैयार किया जाता है।

इस तकनीक में दो भाग होते हैं:

  • Rootstock: जड़ वाला पौधा (यहाँ आलू)
  • Scion: ऊपर का पौधा (यहाँ टमाटर)

जब दोनों को सही तरीके से जोड़ा जाता है तो यह पौधा एक इकाई की तरह विकसित होने लगता है।

पोमेटो पौधा कैसे तैयार किया जाता है?

पोमेटो तैयार करने के लिए निम्न चरण अपनाए जाते हैं:

  1. सबसे पहले आलू का पौधा तैयार किया जाता है
  2. टमाटर की नर्सरी अलग से तैयार की जाती है
  3. दोनों पौधों के तनों की मोटाई समान होने पर कट लगाया जाता है
  4. टमाटर की शाखा को आलू के तने पर जोड़ा जाता है
  5. प्लास्टिक टेप या ग्राफ्टिंग क्लिप से बाँधा जाता है
  6. 10–15 दिनों में दोनों पौधे आपस में जुड़ जाते हैं

एक पौधे से कितना उत्पादन मिलता है?

सामान्य परिस्थितियों में एक पोमेटो पौधे से निम्न उत्पादन प्राप्त हो सकता है:

  • टमाटर: 3 से 4 किलो
  • आलू: 1 से 1.5 किलो

हालांकि उत्पादन किस्म, मिट्टी और देखभाल पर निर्भर करता है।

भारत में किसने विकसित किया?

भारत में पोमेटो तकनीक को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान (IIVR), वाराणसी के वैज्ञानिकों की रही है।

इस तकनीक को विशेष रूप से निम्न उद्देश्यों के लिए विकसित किया गया:

  • किचन गार्डन
  • शहरी खेती
  • छोटे किसानों के प्रयोग

पोमेटो खेती के फायदे

  • कम जगह में दो फसल
  • किचन गार्डन के लिए उपयुक्त
  • शहरी खेती में उपयोगी
  • वैज्ञानिक और शैक्षणिक प्रयोगों के लिए बेहतर

क्या पोमेटो GMO है?

कई लोग सोचते हैं कि पोमेटो जीन परिवर्तित पौधा है, लेकिन यह धारणा गलत है।

पोमेटो:

  • GMO नहीं है
  • जीन एडिटिंग नहीं की जाती
  • केवल ग्राफ्टिंग तकनीक से बनाया जाता है

भविष्य में क्या हो सकती है संभावना?

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में पोमेटो जैसी तकनीकें शहरी खेती और सीमित भूमि वाले किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकती हैं।

हालांकि बड़े स्तर की खेती के लिए अभी यह तकनीक प्रयोगात्मक मानी जाती है, लेकिन एग्री-टेक शोध में इसका महत्व लगातार बढ़ रहा है।

निष्कर्ष: पोमेटो खेती की दुनिया में एक अनोखा प्रयोग है जो यह दर्शाता है कि विज्ञान और कृषि मिलकर किस तरह नई संभावनाएँ पैदा कर सकते हैं। सीमित जमीन और बढ़ती आबादी के दौर में ऐसी तकनीकें भविष्य की खेती को नया दिशा दे सकती हैं।

राकेश खुडिया, श्री गंगानगर

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