श्रीकरणपुर जलदाय विभाग में ठेका पंप चालकों की अनदेखी? पूर्व मंत्री की अनुशंसा के बाद भी भर्ती पर सवाल
राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के श्रीकरणपुर विधानसभा क्षेत्र से जलदाय विभाग से जुड़ा एक मामला इन दिनों चर्चा में है। लंबे समय से विभाग में ठेका प्रथा के तहत कार्यरत पंप चालकों और तकनीकी कर्मचारियों ने सरकार की आगामी भर्ती प्रक्रिया में शामिल किए जाने की मांग उठाई है। कर्मचारियों का कहना है कि वे पिछले कई वर्षों से विभाग की पेयजल व्यवस्था संभाल रहे हैं, लेकिन जब नियमित या संविदा भर्ती की बारी आती है तो अनुभव रखने वाले इन कर्मियों को नजरअंदाज कर दिया जाता है।
इस पूरे मामले में नया मोड़ तब आया जब कर्मचारियों ने अपनी मांगों को लेकर जनप्रतिनिधियों से संपर्क किया। बताया जा रहा है कि कर्मचारियों द्वारा ज्ञापन प्रस्तुत करने के बाद भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष एवं पूर्व मंत्री सुरेन्द्रपाल सिंह टी.टी. ने उनकी मांगों पर सकारात्मक रुख अपनाते हुए संबंधित विभाग को अनुशंसा भेजी। इसके बावजूद कर्मचारियों का आरोप है कि विभागीय अधिकारी इस पर गंभीरता से अमल नहीं कर रहे हैं।
क्या है पूरा मामला
जानकारी के अनुसार श्रीकरणपुर विधानसभा क्षेत्र के जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (जलदाय विभाग) में वर्षों से कई पंप चालक और तकनीकी कार्य से जुड़े कर्मचारी ठेका व्यवस्था के तहत काम कर रहे हैं। इन कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने विभाग के साथ कठिन परिस्थितियों में काम किया है—गर्मी के मौसम में पानी सप्लाई बनाए रखना, मोटर संचालन, लाइन खराब होने पर तत्काल सुधार, गांवों और कस्बों में जलापूर्ति बनाए रखना जैसी जिम्मेदारियां निभाई हैं।
अब राज्य सरकार द्वारा बजट घोषणा 2025-26 में जलदाय विभाग के लिए तकनीकी कर्मचारियों की भर्ती का रास्ता खुलने के बाद इन कर्मियों ने मांग रखी है कि लंबे समय से कार्यरत ठेका पंप चालकों को भी भर्ती प्रक्रिया में शामिल किया जाए या अनुभव के आधार पर प्राथमिकता दी जाए।
पूर्व मंत्री से लगाई गुहार
ठेका कर्मचारियों ने अपनी मांग को लेकर क्षेत्रीय नेतृत्व से संपर्क किया। कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने पूर्व मंत्री और भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष सुरेन्द्रपाल सिंह टी.टी. को ज्ञापन देकर स्थिति बताई। ज्ञापन में कहा गया कि विभाग में कार्यरत कई कर्मी 8 से 10 वर्षों से सेवाएं दे रहे हैं और उन्हें स्थायी अवसर मिलना चाहिए।
सूत्रों के अनुसार सुरेन्द्रपाल सिंह टी.टी. ने इस मांग को उचित मानते हुए संबंधित अधिकारियों को अनुशंसा की कि भर्ती प्रक्रिया में इन कर्मचारियों के हितों पर विचार किया जाए। कर्मचारियों का कहना है कि यह उनके लिए उम्मीद की किरण थी, लेकिन बाद में विभागीय स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नजर नहीं आई।
अधिकारियों पर हठधर्मिता के आरोप
कर्मचारियों की ओर से आरोप लगाया जा रहा है कि विभागीय अधिकारी इस मामले में सकारात्मक रुख नहीं अपना रहे हैं। उनका कहना है कि वर्षों से काम कर रहे कर्मचारियों की स्थिति और अनुभव को देखते हुए राहत दी जानी चाहिए थी, लेकिन अभी तक किसी स्पष्ट प्रक्रिया की घोषणा नहीं हुई।
हालांकि विभागीय अधिकारियों की ओर से इस संबंध में आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आना बाकी है। प्रशासनिक स्तर पर यह भी संभव है कि भर्ती प्रक्रिया राज्य स्तर से तय हो और स्थानीय अधिकारियों के पास सीमित अधिकार हों। फिर भी स्थानीय कर्मचारियों में असंतोष का माहौल दिखाई दे रहा है।
पंप चालकों ने क्या कहा
कार्यरत पंप चालकों ने अपनी आर्थिक और सेवा संबंधी समस्याओं को भी सामने रखा है। उनका आरोप है कि ठेका प्रथा में काम करने वालों को समय पर वेतन नहीं दिया जाता। कई बार भुगतान 4 से 5 महीने तक अटक जाता है। कर्मचारियों ने दावा किया कि उन्हें 6 से 7 हजार रुपये तक मासिक भुगतान मिलता है, जो वर्तमान महंगाई के दौर में बेहद कम है।
कुछ कर्मचारियों ने यह भी आरोप लगाया कि भुगतान कई बार बैंक खाते के बजाय नगद दिया जाता है। यदि यह आरोप सही हैं, तो यह श्रम कानूनों और पारदर्शिता दोनों के लिहाज से गंभीर प्रश्न खड़े कर सकता है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है।
जलदाय विभाग में पंप चालकों की भूमिका क्यों अहम है
ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति का पूरा ढांचा तकनीकी स्टाफ पर निर्भर करता है। पंप चालक मोटर संचालन, जलाशयों की भराई, लाइन प्रेशर नियंत्रण, तकनीकी खराबियों की सूचना और कई जगह प्राथमिक स्तर की मरम्मत तक संभालते हैं। गर्मी के मौसम में जब पानी की मांग बढ़ती है, तब इन कर्मचारियों पर काम का दबाव और अधिक बढ़ जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जो कर्मचारी वर्षों से जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं, उनके पास स्थानीय नेटवर्क, मशीनरी और सिस्टम की व्यावहारिक समझ होती है। ऐसे कर्मियों को भर्ती प्रक्रिया में अनुभव आधारित लाभ देना विभाग के हित में भी हो सकता है।
ठेका प्रथा पर फिर उठे सवाल
सरकारी विभागों में ठेका प्रथा को लेकर लंबे समय से बहस चलती रही है। समर्थकों का तर्क है कि इससे त्वरित नियुक्तियां संभव होती हैं और खर्च नियंत्रित रहता है। विरोधियों का कहना है कि इससे कर्मचारियों का शोषण बढ़ता है, नौकरी असुरक्षित रहती है और वेतन व सामाजिक सुरक्षा का अभाव रहता है।
श्रीकरणपुर का यह मामला भी उसी बहस को फिर सामने लाता है। जब कोई कर्मचारी 8 से 10 वर्षों तक लगातार काम कर चुका हो, तो क्या उसे केवल ठेका कर्मचारी मानकर छोड़ देना न्यायसंगत है? यह सवाल केवल स्थानीय नहीं, बल्कि राज्य स्तरीय नीति से जुड़ा मुद्दा बन सकता है।
सरकार के सामने संतुलन की चुनौती
राज्य सरकार के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर नए बेरोजगार युवाओं को अवसर देना जरूरी है, दूसरी ओर वर्षों से कार्यरत अनुभवी कर्मचारियों को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी कठिन है। कई राज्यों में संविदा या अस्थायी कर्मियों को भर्ती में बोनस अंक, आयु सीमा में छूट या अनुभव वेटेज देने जैसे मॉडल अपनाए गए हैं।
यदि राजस्थान सरकार भी ऐसा कोई संतुलित मॉडल अपनाती है, तो नए युवाओं और पुराने कर्मियों दोनों के हित साधे जा सकते हैं।
श्रीकरणपुर क्षेत्र में यह मुद्दा क्यों बड़ा है
सीमावर्ती और ग्रामीण क्षेत्रों में जलदाय विभाग की भूमिका सामान्य शहरों से अधिक महत्वपूर्ण होती है। यहां पेयजल सप्लाई बाधित होने पर लोगों को सीधा असर झेलना पड़ता है। ऐसे में विभाग का मैदानी स्टाफ मजबूत और प्रेरित होना जरूरी है। यदि कर्मचारी असंतुष्ट हैं, वेतन लंबित है या नौकरी असुरक्षित है, तो सेवा गुणवत्ता पर भी असर पड़ सकता है।
अब आगे क्या हो सकता है
यदि कर्मचारियों की मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में ज्ञापन, धरना, विरोध प्रदर्शन या जिला स्तर पर आंदोलन की स्थिति बन सकती है। दूसरी ओर यदि सरकार या विभाग कोई सकारात्मक संकेत देता है तो मामला शांत हो सकता है।
कर्मचारियों की प्रमुख मांगें इस प्रकार सामने आ रही हैं:
- भर्ती प्रक्रिया में ठेका पंप चालकों को शामिल किया जाए
- अनुभव आधारित वरीयता दी जाए
- वेतन समय पर मिले
- भुगतान पारदर्शी तरीके से बैंक खातों में हो
- लंबे समय से कार्यरत कर्मियों के भविष्य को सुरक्षित किया जाए
निष्कर्ष
श्रीकरणपुर का यह मामला केवल कुछ कर्मचारियों की नौकरी मांग तक सीमित नहीं है। यह सरकारी विभागों में ठेका व्यवस्था, अनुभव की मान्यता, श्रमिक सम्मान और भर्ती नीति जैसे बड़े सवालों को सामने लाता है। यदि वर्षों से सेवा दे रहे कर्मियों की मांगों को अनसुना किया जाता है, तो असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार, जनप्रतिनिधि और विभागीय अधिकारी इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाते हैं। यदि संतुलित समाधान निकाला गया तो यह प्रदेशभर के ठेका कर्मचारियों के लिए मिसाल बन सकता है।

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राकेश खुडिया