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पहाड़ों से गायब हो रही हैं च्यवनप्राश की जड़ी-बूटियां, हिमालय में बढ़ा बड़ा पर्यावरणीय संकट

हिमालय में जलवायु परिवर्तन और अवैध दोहन के कारण खत्म होती च्यवनप्राश की दुर्लभ जड़ी-बूटियों को दर्शाता प्रतीकात्मक थंबनेल
ट्रेंड2in न्यूज डेस्क
राकेश खुडिया

हिमालय की वादियों में कभी सहजता से मिलने वाली कई दुर्लभ औषधीय जड़ी-बूटियां अब धीरे-धीरे पहाड़ों से गायब होती जा रही हैं। आयुर्वेद की दुनिया में जिन वनस्पतियों को शरीर की ताकत, रोग प्रतिरोधक क्षमता और लंबे जीवन का आधार माना जाता रहा, आज वही वनस्पतियां जलवायु परिवर्तन, बढ़ते व्यावसायिक दबाव और अनियंत्रित दोहन के कारण संकट में पहुंच गई हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते इन जड़ी-बूटियों के संरक्षण के लिए गंभीर कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में कई पारंपरिक आयुर्वेदिक औषधियां प्रभावित हो सकती हैं।

च्यवनप्राश, हर्बल टॉनिक, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली दवाएं और कई पारंपरिक आयुर्वेदिक औषधियों में उपयोग होने वाली काकोली, क्षीर काकोली, जीवक, ऋषभक, मेदा और महा मेदा जैसी जड़ी-बूटियां हिमालय के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाई जाती हैं। आयुर्वेद विशेषज्ञों के अनुसार इन वनस्पतियों का उपयोग शरीर की कमजोरी दूर करने, फेफड़ों को मजबूत बनाने, मानसिक तनाव कम करने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए किया जाता है। लेकिन अब इनकी संख्या तेजी से घटती जा रही है।

विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते तापमान और बदलते मौसम चक्र का सबसे बड़ा असर दुर्लभ वनस्पतियों पर पड़ रहा है। कई पौधे केवल विशेष तापमान और विशेष ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ही विकसित होते हैं। जब वहां का मौसम बदलता है तो उनका प्राकृतिक जीवन चक्र प्रभावित होने लगता है। पिछले कुछ वर्षों में हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी कम हुई है और तापमान में लगातार बदलाव देखा गया है। इसका सीधा असर वहां की जैव विविधता पर पड़ रहा है।

वन अनुसंधान से जुड़े विशेषज्ञ बताते हैं कि लगभग 2500 से 4500 मीटर ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मिलने वाली इन जड़ी-बूटियों पर अब विलुप्ति का खतरा मंडराने लगा है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश जैसे क्षेत्रों में इन वनस्पतियों की संख्या पहले की तुलना में काफी कम हो चुकी है। कई स्थानों पर तो ये वनस्पतियां बहुत मुश्किल से दिखाई देती हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार समस्या केवल जलवायु परिवर्तन तक सीमित नहीं है। आयुर्वेदिक दवाओं की बढ़ती मांग ने भी इन जड़ी-बूटियों पर भारी दबाव डाल दिया है। कोरोना महामारी के बाद इम्यूनिटी बढ़ाने वाले उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ी। च्यवनप्राश और हर्बल दवाओं का बाजार अचानक बड़ा हो गया। इसके चलते दुर्लभ जड़ी-बूटियों की मांग भी कई गुना बढ़ गई। लेकिन संरक्षण की गति उतनी तेज नहीं बढ़ी जितनी तेजी से बाजार बढ़ा।

हिमालयी क्षेत्रों में कई जगह स्थानीय लोग और अवैध तस्कर बड़ी मात्रा में जड़ी-बूटियां निकालकर बेच रहे हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि इन पौधों की जड़ें ही औषधि के रूप में उपयोग होती हैं। ऐसे में जब जड़ समेत पौधा निकाल लिया जाता है तो वह दोबारा विकसित नहीं हो पाता। कुछ पौधों को दोबारा प्राकृतिक रूप से विकसित होने में कई वर्ष लग जाते हैं। लगातार दोहन के कारण उनका प्राकृतिक चक्र टूट रहा है।

हिमालय की जैव विविधता पर बढ़ता खतरा

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालय केवल पर्यटन और नदियों का स्रोत नहीं है बल्कि यह भारत की पारंपरिक औषधीय विरासत का भी सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है। हजारों वर्षों से भारतीय आयुर्वेद जिन जड़ी-बूटियों पर आधारित रहा, उनमें से बड़ी संख्या हिमालयी क्षेत्रों में ही पाई जाती है। ऐसे में यदि ये वनस्पतियां समाप्त होती हैं तो इसका असर केवल पर्यावरण पर नहीं बल्कि चिकित्सा प्रणाली पर भी पड़ेगा।

कई वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले वर्षों में दुर्लभ जड़ी-बूटियों का संकट और गंभीर हो सकता है। हिमालयी क्षेत्रों में सड़क निर्माण, बढ़ता पर्यटन, अवैध कटान और मानव गतिविधियों का विस्तार भी इन वनस्पतियों के प्राकृतिक आवास को प्रभावित कर रहा है। मिट्टी की नमी, तापमान और प्राकृतिक वातावरण में बदलाव का असर सीधे इन पौधों की वृद्धि पर पड़ रहा है।

कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि अब केवल जंगलों पर निर्भर रहकर इन वनस्पतियों को बचाया नहीं जा सकता। इनके लिए नियंत्रित खेती और वैज्ञानिक संरक्षण जरूरी हो गया है। कई अनुसंधान संस्थान अब इन पौधों की नर्सरी तैयार कर रहे हैं। वैज्ञानिक बीज संरक्षण और लैब आधारित तकनीकों पर भी काम कर रहे हैं ताकि भविष्य में इन पौधों को दोबारा विकसित किया जा सके।

हालांकि यह काम आसान नहीं माना जाता। कई दुर्लभ वनस्पतियां केवल विशेष ऊंचाई और विशेष तापमान में ही विकसित होती हैं। सामान्य खेती की तरह इन्हें उगाना संभव नहीं है। यही कारण है कि वैज्ञानिकों को कृत्रिम वातावरण तैयार करने की दिशा में भी काम करना पड़ रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि स्थानीय समुदायों को संरक्षण प्रक्रिया में शामिल किया जाए तो स्थिति बेहतर हो सकती है। पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को नियंत्रित तरीके से जड़ी-बूटियों की खेती और संग्रह की ट्रेनिंग दी जा सकती है। इससे उनकी आय भी बढ़ेगी और वनस्पतियों का संरक्षण भी संभव होगा।

हर्बल उद्योग से जुड़े जानकार बताते हैं कि आज पूरी दुनिया प्राकृतिक चिकित्सा और हर्बल उपचार की ओर लौट रही है। ऐसे समय में हिमालय की दुर्लभ औषधीय वनस्पतियों का महत्व और बढ़ गया है। लेकिन यदि इन्हें बचाने के लिए अभी बड़े स्तर पर काम नहीं हुआ तो आने वाली पीढ़ियों को केवल किताबों में इनके बारे में पढ़ना पड़ेगा।

पर्यावरणविदों का कहना है कि सरकारों को हिमालयी क्षेत्रों में औषधीय पौधों के संरक्षण को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना चाहिए। जिस तरह वन्यजीव संरक्षण के लिए बड़े अभियान चलाए गए, उसी तरह दुर्लभ जड़ी-बूटियों के लिए भी विशेष संरक्षण मिशन शुरू करने की जरूरत है।

विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि आज संरक्षण नहीं किया गया तो भविष्य में आयुर्वेदिक उद्योग को कच्चे माल की भारी कमी का सामना करना पड़ सकता है। इससे दवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं और कई पारंपरिक औषधियां दुर्लभ हो सकती हैं। यही कारण है कि अब इस मुद्दे को केवल पर्यावरण नहीं बल्कि स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़े बड़े संकट के रूप में देखा जा रहा है।





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