श्रीगंगानगर मंडियों में बारदाने का बड़ा खेल? किसान परेशान, निजी मकान से हजारों कट्टे मिलने पर जांच की मांग
राजस्थान के सीमावर्ती जिले श्रीगंगानगर को प्रदेश का अन्न भंडार कहा जाता है। यहां हर साल गेहूं, सरसों और अन्य फसलों की भारी आवक होती है। जब सरकारी खरीद शुरू होती है तो किसानों की उम्मीद रहती है कि उनकी उपज समय पर तौली जाएगी, भुगतान मिलेगा और फसल सुरक्षित तरीके से उठान होगी। लेकिन इस बार गेहूं खरीद सीजन के दौरान मंडियों में बारदाने यानी कट्टों की कमी ने पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला केवल देरी का नहीं, बल्कि भरोसे का बन चुका है।
जिले की कई मंडियों से यह शिकायतें सामने आईं कि खरीद केंद्रों पर पर्याप्त कट्टे उपलब्ध नहीं थे। किसान ट्रैक्टर-ट्रॉलियां भरकर मंडी पहुंचे, लेकिन तुलाई की रफ्तार धीमी पड़ गई। इसी बीच रावला मंडी क्षेत्र से खबर आई कि एक निजी मकान से हजारों खाली कट्टे मिले हैं। अब किसान पूछ रहे हैं—यदि कट्टों की कमी थी तो निजी मकान तक इतनी बड़ी संख्या में कट्टे पहुंचे कैसे?
मंडी में किसान की सबसे बड़ी परेशानी: इंतजार
ग्राउंड स्तर पर किसानों की पहली शिकायत यही है कि मंडी में पहुंचने के बाद उन्हें लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। कई किसानों का कहना है कि वे सुबह जल्दी पहुंचते हैं, लेकिन नंबर देर शाम तक नहीं आता। कुछ किसानों को अगले दिन तक रुकना पड़ता है। जब फसल कटकर खेत से निकल चुकी हो, मजदूरी लग चुकी हो और ट्रांसपोर्ट का खर्च अलग हो, तब हर घंटे की देरी किसान की जेब पर सीधा असर डालती है।
किसान बताते हैं कि यदि बरदाना पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो तो खरीद प्रक्रिया तेज हो सकती है। लेकिन जहां कट्टों की कमी होती है, वहां तुलाई, भराई, सिलाई और लोडिंग सब प्रभावित हो जाते हैं। मंडी में काम रुकते ही किसानों की लाइन लंबी होती जाती है।
बरदाना क्यों इतना महत्वपूर्ण है?
सरकारी खरीद व्यवस्था में बारदाने सबसे बुनियादी संसाधनों में से एक है। गेहूं खरीदने के बाद उसे सुरक्षित रखने, गोदाम तक पहुंचाने और रिकॉर्ड अनुसार स्टॉक प्रबंधन के लिए कट्टों की जरूरत होती है। यदि कट्टे नहीं होंगे तो खरीद प्रक्रिया कागजों में चल सकती है, जमीन पर नहीं।
इसी कारण हर सीजन से पहले खरीद एजेंसियों को पर्याप्त स्टॉक, परिवहन और गुणवत्ता की तैयारी करनी होती है। यदि शुरुआती दिनों में ही कमी सामने आ जाए तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि तैयारी की विफलता मानी जाती है।
श्रीगंगानगर धान मंडी में सामने आई नाराजगी
स्थानीय स्तर पर सामने आई जानकारी के अनुसार श्रीगंगानगर की नई धान मंडी में खरीद प्रभावित होने की खबरें सामने आईं। कहा गया कि खरीद एजेंसी पर्याप्त बारदाना उपलब्ध नहीं करवा पा रही थी। इससे MSP पर गेहूं खरीद की रफ्तार धीमी पड़ी।
बाद में बड़ी संख्या में बरदाना पहुंचने की बात सामने आई, लेकिन कई कट्टों के खराब, फटे या कमजोर होने की शिकायतें भी उठीं। इससे किसानों और व्यापारियों में असंतोष बढ़ गया। सवाल उठा कि यदि बारदाना देर से आया भी, तो उसकी गुणवत्ता मानकों पर खरी क्यों नहीं उतरी?
रावला मंडी का मामला क्यों गंभीर है?
रावला मंडी क्षेत्र से आई खबर ने पूरे जिले का ध्यान खींचा। रिपोर्ट्स के अनुसार एक व्यापारी के किराए के मकान से हजारों खाली कट्टे मिलने की बात सामने आई। यदि यह तथ्य जांच में सही पाया जाता है, तो मामला बेहद गंभीर माना जाएगा। क्योंकि उस समय मंडियों में किसान बारदाने की कमी झेल रहे थे।
यहां सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि ये कट्टे किसके थे, किस प्रयोजन से रखे गए थे, किसने पहुंचाए थे और क्या यह स्टॉक वैध रिकॉर्ड में दर्ज था? यदि कट्टे निजी उपयोग या व्यापारिक प्रयोजन से रखे गए थे, तो उसका दस्तावेजी आधार क्या है? यदि सरकारी आपूर्ति से जुड़े थे, तो निजी मकान तक पहुंचने का रास्ता कैसे बना?
क्या जिले की अन्य मंडियों में भी ऐसा हो सकता है?
किसान संगठनों और व्यापारिक हलकों में चर्चा अब केवल एक घटना तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि क्या अन्य मंडियों में भी कट्टों की कृत्रिम कमी दिखाई जाती है? क्या कुछ जगहों पर स्टॉक रोककर बाद में बांटा जाता है? क्या वितरण प्रक्रिया में प्राथमिकता और पारदर्शिता का अभाव है?
यह जरूरी नहीं कि हर जगह गड़बड़ी हो, लेकिन जब एक जिले में एक से अधिक मंडियों से कमी की शिकायतें आएं और साथ ही निजी स्थान पर स्टॉक मिलने की खबर भी हो, तो व्यापक जांच की मांग स्वाभाविक हो जाती है।
किसानों को असली नुकसान कैसे होता है?
बरदाने की कमी का सबसे बड़ा असर छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ता है। बड़े व्यापारी या बड़े उत्पादक कुछ समय रुक सकते हैं, लेकिन छोटे किसान के लिए ट्रॉली का अतिरिक्त किराया, मजदूरों का खर्च और समय की बर्बादी भारी पड़ती है।
यदि मौसम बदल जाए, आंधी या बारिश आ जाए, तो खुली फसल खराब होने का खतरा रहता है। नमी बढ़ने पर गुणवत्ता कट सकती है। ऐसे में किसान को MSP का लाभ भी पूरी तरह नहीं मिल पाता।
व्यापारियों की भूमिका और तर्क
व्यापारियों का पक्ष यह रहता है कि मंडी संचालन में उन्हें सीमित संख्या में कट्टे दिए जाते हैं और उसी आधार पर खरीद व भंडारण होता है। वे यह भी कहते हैं कि कट्टों की सप्लाई अनियमित होने से उनका काम भी प्रभावित होता है।
लेकिन जब निजी परिसरों में हजारों कट्टे मिलने जैसी खबर आती है, तब यही तर्क कमजोर पड़ जाता है। इसलिए जरूरी है कि प्रशासन व्यापारियों को भी साथ लेकर पारदर्शी जांच करे, ताकि सही और गलत स्पष्ट हो सके।
प्रशासन के सामने कौन-कौन से सवाल?
- जिले को कुल कितना बारदाना आवंटित हुआ?
- किस मंडी को कितनी सप्लाई भेजी गई?
- रिकॉर्ड और वास्तविक स्टॉक में कितना अंतर है?
- खराब बरदाना किस सप्लायर से आया?
- रावला क्षेत्र में मिले कट्टों का स्रोत क्या है?
- क्या किसी स्तर पर स्टॉक डायवर्जन हुआ?
- क्या समय पर निगरानी नहीं की गई?
डिजिटल ट्रैकिंग क्यों जरूरी है?
आज जब हर विभाग डिजिटल रिकॉर्ड की ओर बढ़ रहा है, तब बारदाना वितरण व्यवस्था भी पूरी तरह ट्रैकिंग सिस्टम पर लाई जा सकती है। हर खेप पर QR कोड, ऑनलाइन स्टॉक अपडेट, मंडीवार उपलब्धता और दैनिक उपयोग का डेटा सार्वजनिक किया जा सकता है।
यदि ऐसा हो तो कोई भी किसान, व्यापारी या अधिकारी देख सकेगा कि किस मंडी में कितना स्टॉक है। इससे कृत्रिम कमी, गलत सूचना और हेरफेर की गुंजाइश कम होगी।
जांच कैसे होनी चाहिए?
सिर्फ बयानबाजी या कागजी जांच से भरोसा नहीं बनेगा। जिले की सभी प्रमुख मंडियों में संयुक्त टीम भेजी जानी चाहिए, जिसमें प्रशासन, खरीद एजेंसी, कृषि विपणन विभाग और स्वतंत्र लेखा टीम शामिल हो। पिछले 30 दिनों का स्टॉक रजिस्टर, आवंटन आदेश, परिवहन बिल और वास्तविक उपलब्धता मिलाई जानी चाहिए।
यदि कहीं निजी परिसरों में कट्टे मिले हैं तो उनके दस्तावेज, खरीद रसीद, स्रोत और उपयोग का रिकॉर्ड जांचा जाना चाहिए। दोषी चाहे कोई भी हो, कार्रवाई समान रूप से होनी चाहिए।
जनता का भरोसा सबसे बड़ा मुद्दा
सरकारी खरीद व्यवस्था केवल फसल खरीदने का सिस्टम नहीं है, यह किसान और सरकार के बीच भरोसे की डोर है। किसान अपनी उपज इसलिए मंडी लाता है क्योंकि उसे उम्मीद होती है कि यहां पारदर्शी व्यवस्था मिलेगी। यदि कट्टों जैसी बुनियादी चीज पर सवाल उठने लगें तो यह भरोसा कमजोर होता है।
याद रखना होगा कि किसान केवल अनाज नहीं बेचता, वह अपनी पूरी मेहनत मंडी तक लेकर आता है।
क्या समाधान संभव है?
- सीजन शुरू होने से पहले पर्याप्त बरदाना स्टॉक
- गुणवत्ता जांच के बाद ही सप्लाई
- मंडीवार लाइव स्टॉक डिस्प्ले
- किसान हेल्पलाइन और शिकायत पोर्टल
- निजी स्टॉकिंग पर सख्त निगरानी
- दोषियों पर त्वरित कार्रवाई
निष्कर्ष: सवालों का जवाब जरूरी
श्रीगंगानगर जिले की मंडियों में बरदाने का मुद्दा अब सामान्य प्रशासनिक कमी नहीं रह गया है। एक तरफ किसानों की फसल मंडी में रुकी, दूसरी तरफ निजी मकान से हजारों कट्टे मिलने की खबर ने संदेह बढ़ा दिया है। सच जो भी हो, उसे सामने लाना जरूरी है।
यदि यह केवल अव्यवस्था है तो सुधार हो। यदि गड़बड़ी है तो कार्रवाई हो। यदि सिस्टम कमजोर है तो मजबूत किया जाए। क्योंकि अन्नदाता की फसल इंतजार में खड़ी रहे और कट्टे कहीं और पड़े मिलें—यह किसी भी स्वस्थ खरीद व्यवस्था की तस्वीर नहीं हो सकती।

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राकेश खुडिया